Operation Safed Sagar Review: देशभक्ति के शोर के बीच एक युद्ध कहानी, जो आखिर में अपनी ही राह से भटक गई

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Operation Safed Sagar Review: बॉलीवुड में युद्ध फिल्मों का नाम आते ही अब दर्शकों के दिमाग में कुछ तय तस्वीरें बनने लगी हैं। तिरंगा, जोशीले संवाद, दुश्मन के खिलाफ गुस्सा और सैनिकों को सलाम करते लंबे-लंबे सीन। पिछले कुछ वर्षों में ऐसी फिल्मों की भरमार ने इस जॉनर को इतना दोहराव भरा बना दिया है कि सोशल मीडिया पर इनके क्लिशे तक मीम बन चुके हैं।

ऐसे समय में आई ‘Operation Safed Sagar’ शुरुआत में उम्मीद जगाती है। यह 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना के उस ऑपरेशन पर आधारित है, जिसे ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ नाम दिया गया था। छह एपिसोड की यह सीरीज भारतीय वायुसेना के ‘Golden Arrows’ स्क्वाड्रन और उसके जांबाज पायलटों की कहानी बताती है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सीरीज युद्ध और देशभक्ति को एक नए नजरिए से दिखा पाती है? जवाब है। कुछ हद तक हां, लेकिन अंत तक पहुंचते-पहुंचते यह भी उसी पुराने रास्ते पर लौट आती है।

Operation Safed Sagar Review शुरुआत में दिखती है एक अलग तरह की देशभक्ति

सीरीज की सबसे अच्छी बात यह है कि शुरुआत में यह सैनिकों को सिर्फ ‘देश के लिए मर-मिटने वाले सुपरहीरो’ की तरह पेश नहीं करती।

यहां सैनिक हंसते हैं, मजाक करते हैं, परिवार को याद करते हैं और अपनी निजी परेशानियों से भी जूझते हैं। यही चीज कहानी को जमीन से जोड़ती है।

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा का किरदार इस मामले में सबसे अलग नजर आता है। सिद्धार्थ ने इस किरदार को बेहद शांत अंदाज में निभाया है। जहां बाकी युवा पायलटों में जोश और आक्रामकता नजर आती है, वहीं अजय की शख्सियत में एक ठहराव है।

उनका पुराने स्कूटर पर एयरफोर्स बेस पहुंचना और विंग कमांडर टोनी का यह मजाक करना कि MiG विमान और उनका स्कूटर लगभग एक ही उम्र के हैं—सीरीज के उन छोटे लेकिन प्रभावी पलों में से है, जो कहानी को इंसानी बनाते हैं।

Operation Safed Sagar Review: Top Gun की याद दिलाती है एयरफोर्स ट्रेनिंग

सीरीज के शुरुआती एपिसोड में पायलटों की ट्रेनिंग और मिशन प्लानिंग को काफी दिलचस्प तरीके से दिखाया गया है।

दुश्मन के इलाके की तस्वीरें लेने से लेकर Surface-to-Air Missiles यानी SAM से बचने तक, पायलटों की रणनीति कहानी में रोमांच पैदा करती है।

एक ट्रेनिंग मिशन में पायलट बेहद करीब उड़ते हैं, ताकि दुश्मन के रडार पर कई विमानों की जगह सिर्फ एक डॉट दिखाई दे। ऐसे सीक्वेंस दर्शकों को रोमांचित करते हैं और कहीं-कहीं 2021 की Top Gun: Maverick की याद भी दिलाते हैं।

लेकिन सीरीज की असली खूबसूरती सिर्फ आसमान में उड़ते लड़ाकू विमानों में नहीं, बल्कि एयरफोर्स बेस पर मौजूद रिश्तों में है।

सैनिकों की दोस्ती और जिंदगी बनी कहानी की ताकत

‘बाउंसिंग’ नाम की एक मजेदार परंपरा कहानी के हल्के और खूबसूरत हिस्सों में से एक है। जूनियर अधिकारी बिना बताए सीनियर के घर पहुंच जाते हैं, जहां उनका स्वागत खाने और पीने के साथ होता है। लेकिन उसके बाद उन्हें रसोई में सब्जियां काटने जैसे काम भी करने पड़ते हैं।

ऐसे दृश्य बताते हैं कि वर्दी के पीछे भी आखिर एक आम इंसान ही होता है।

यही वह पहलू है, जो ‘Operation Safed Sagar’ को शुरुआत में बाकी कई युद्ध फिल्मों से अलग करता है।

सिद्धार्थ और जिम्मी शेरगिल की मजबूत मौजूदगी

सिद्धार्थ और जिम्मी शेरगिल दोनों ही देशभक्ति फिल्मों के इस क्षेत्र से पहले भी जुड़े रहे हैं।

सिद्धार्थ का शांत और नियंत्रित अभिनय अजय आहूजा के किरदार में जान डालता है, जबकि जिम्मी शेरगिल विंग कमांडर टोनी के रूप में प्रभाव छोड़ते हैं।

युवा पायलटों में धाली, बाल्डी, सांगी और गूफी जैसे किरदार शामिल हैं। इनमें बाल्डी का किरदार सबसे ज्यादा ध्यान खींचता है क्योंकि उसके भीतर आत्मविश्वास के साथ-साथ डर और असमंजस भी है।

Operation Safed Sagar Review: प्रेम कहानी कमजोर कड़ी बन जाती है

बाल्डी और माधवी की प्रेम कहानी सीरीज के कमजोर हिस्सों में शामिल है।

माधवी घर से भागकर एयरफोर्स बेस पहुंचती है और आहूजा परिवार उसे अपने घर में जगह देता है। इसके बाद बाल्डी को अपने रिश्ते और एयरफोर्स की जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।

कहानी में इस ट्रैक की संभावनाएं काफी थीं, लेकिन इसे जिस तरह पेश किया गया है, वह कई जगह सामान्य Netflix रोमांटिक कॉमेडी जैसा महसूस होता है।

माधवी के संवाद और उसका व्यवहार कहानी की गंभीरता के मुकाबले कई बार बनावटी लगता है।

Operation Safed Sagar Review: पाकिस्तान की राजनीति को दिखाने की कोशिश सराहनीय

Operation Safed Sagar Review: देशभक्ति के शोर के बीच एक युद्ध कहानी, जो आखिर में अपनी ही राह से भटक गई

सीरीज का एक दिलचस्प पहलू पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व का चित्रण है।

नवाज शरीफ को एक ऐसे प्रधानमंत्री के रूप में दिखाया गया है, जो सेना और राजनीतिक दबाव के बीच फंसा हुआ है। वहीं परवेज मुशर्रफ का किरदार ज्यादा ताकतवर और प्रभावशाली नजर आता है।

पाकिस्तानी सेना, सरकार और ISI के बीच सत्ता का संघर्ष दिखाने की कोशिश कहानी को सामान्य बॉलीवुड युद्ध फिल्मों से ज्यादा जटिल बनाती है।

यही हिस्सा सीरीज को एक बेहतर राजनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भ दे सकता था।

लेकिन युद्ध शुरू होते ही कहानी बदल जाती है

यहीं से ‘Operation Safed Sagar’ की सबसे बड़ी समस्या सामने आती है।

युद्ध शुरू होते ही जिस संतुलन और जटिलता को कहानी ने शुरुआत में बनाया था, वह धीरे-धीरे गायब होने लगती है।

भारतीय सैनिकों की मौत के बीच पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों को क्रिकेट देखते हुए दिखाया जाता है। एक तरफ पकड़े गए भारतीय पायलट के साथ सम्मानजनक व्यवहार करने का आदेश दिया जाता है, वहीं कुछ ही देर बाद उससे जबरन कबूलनामा लेने और यातना देने की कोशिश दिखाई जाती है।

समस्या यह नहीं है कि कहानी पाकिस्तानी सेना की आलोचना करती है। समस्या यह है कि इन दोनों व्यवहारों के बीच जरूरी मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक कड़ी कहानी ठीक से स्थापित नहीं कर पाती।

इस वजह से किरदार कई बार विरोधाभासी लगने लगते हैं।

आखिरी दो एपिसोड में बढ़ जाता है देशभक्ति का तापमान

शुरुआत में जो सीरीज संयम दिखाती है, वही क्लाइमैक्स के करीब पहुंचते-पहुंचते काफी पारंपरिक हो जाती है।

शहीद सैनिक की पत्नी का अपने पति को सुरक्षित रखने का वादा करने वाले साथी से सवाल करना, पायलटों के बीच जोशीली बातचीत और असंभव नजर आने वाले मिशन को पूरा करने का फैसला ये सभी दृश्य बॉलीवुड की पुरानी युद्ध फिल्मों की याद दिलाते हैं।

यहां तक कि संवाद भी कई जगह इतने अनुमानित हो जाते हैं कि दर्शक आसानी से अगला दृश्य समझ सकता है।

Operation Safed Sagar Review: क्या सीरीज युद्ध की कीमत दिखाती है?

यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।

‘Operation Safed Sagar’ भारतीय सैनिकों की बहादुरी और बलिदान को मजबूती से सामने रखती है। लेकिन युद्ध की मानवीय कीमत पर उतनी गहराई से बात नहीं करती।

भारतीय सैनिकों के शवों को दिखाया जाता है और दर्शकों में गुस्सा पैदा करने वाले दृश्य रखे जाते हैं। इसके बाद भारतीय वायुसेना की जीत के साथ कहानी तेजी से जश्न की ओर बढ़ जाती है।

ऐसे में युद्ध सिर्फ रणनीति और विजय का खेल बनकर रह जाता है, जबकि असली युद्ध अपने पीछे परिवारों, रिश्तों और जिंदगी भर के घाव छोड़ जाता है।

ऐतिहासिक घटनाओं का इस्तेमाल कितना संतुलित है?

कारगिल युद्ध से जुड़ी कई घटनाएं इतिहास में दर्ज हैं। भारतीय सैनिकों के शवों के साथ हुई बर्बरता और पाकिस्तान द्वारा अपने सैनिकों के शव स्वीकार न करने जैसे प्रसंगों को सीरीज में शामिल किया गया है।

लेकिन समस्या यह है कि कई जगह ये घटनाएं ऐतिहासिक संदर्भ देने के बजाय दर्शकों की भावनाओं को और भड़काने के लिए इस्तेमाल होती हुई दिखाई देती हैं।

यही वह जगह है जहां सीरीज अपने शुरुआती संतुलित दृष्टिकोण से दूर चली जाती है।

Operation Safed Sagar Review: क्या देखें या नहीं?

अगर आपको भारतीय वायुसेना, कारगिल युद्ध, फाइटर जेट्स और सैन्य रणनीति पर आधारित कहानियां पसंद हैं, तो ‘Operation Safed Sagar’ आपको जरूर पसंद आ सकती है।

इसके शुरुआती एपिसोड खास तौर पर मजबूत हैं। एयरफोर्स बेस की जिंदगी, पायलटों की दोस्ती, ट्रेनिंग मिशन और सिद्धार्थ-जिम्मी शेरगिल का अभिनय कहानी को संभालकर रखता है।

लेकिन अंतिम एपिसोड में सीरीज जरूरत से ज्यादा भावनात्मक और राष्ट्रवादी हो जाती है। जिस संतुलन की उम्मीद शुरुआत में पैदा होती है, वह अंत तक कायम नहीं रह पाता।

Operation Safed Sagar Review पर हमारा फैसला

Operation Safed Sagar एक अच्छी शुरुआत वाली लेकिन असमान युद्ध सीरीज है।

यह बताती है कि देशभक्ति को सिर्फ ऊंचे संवादों और दुश्मन से नफरत के जरिए दिखाने की जरूरत नहीं है। सैनिकों की सामान्य जिंदगी, उनके डर, दोस्ती, परिवार और जिम्मेदारियां भी देशभक्ति को उतना ही मजबूत बना सकती हैं।

काश, सीरीज अपने अंतिम दो एपिसोड में भी वही संयम बनाए रखती जो शुरुआत में दिखाई देता है।

रेटिंग: ⭐⭐⭐½/5

कहां देखें: Netflix
एपिसोड: 6
जॉनर: War, Drama, Military
पृष्ठभूमि: 1999 Kargil War और Operation Safed Sagar

निष्कर्ष:
‘Operation Safed Sagar’ आसमान में उड़ते लड़ाकू विमानों की कहानी जरूर है, लेकिन इसकी असली ताकत जमीन पर मौजूद उन इंसानों में है जो उन विमानों को उड़ाते हैं। अफसोस सिर्फ इतना है कि अंत में कहानी इंसान से ज्यादा राष्ट्रवादी प्रतीक बनने की कोशिश करने लगती है।

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